लघु कहानी 'परदा '

 


"अपने को पर्दा कहानी का पात्र होने से बचाइए "


प्रसिद्ध साहित्यकार "यशपाल" कृत एक कहानी  " पर्दा "  किशोरावस्था में पढ़ा था .तब का किशोर मन सिर्फ कहानी के पात्रों का चरित्र चित्रण कर परीक्षा के २ अंक  हासिल करने से अधिक नहीं सोच पाया. पर ये नहीं पता था की ये कहानी कभी  वास्तविकता के धरातल पर सही उतरती प्रतीत होगी.     

यह  चौधरी   पीरबख्श नामक  एक परिवार की कहानी है. जिसके  दादा चुंगी विभाग में दरोगा थे.  एक बड़ी हवेली बना रखी थी. दरोगा जी के जाने के बाद ऊपरी कमाई से आया धन उसी तरह खर्च हो गया. बाल बच्चे मैट्रिक से आगे नहीं बढ़ सके.  परिवार  बड़ा हुआ और घर में  जगह की  तंगी हुई तो चौधरी पीरबक्श ने घर की ड्योढ़ी पर एक पर्दा टंगवा दिया. भौतिक रूप से ये  पर्दा तो घर की महिलाओं को उठने बैठने की जगह देने के लिए लगाया गया  था पर बौद्धिक रूप से ये घर की आर्थिक स्थिति  और चौधरी साहब की मुहल्ले में इज़्ज़त के  बीच एक झीना पर्दा था . जिसको बचाने के लिए चौधरी पीरबख्श ने अपनी  सारी बुद्धि लगा दी थी .

      दिन पर दिन घर की आर्थिक स्थिति ख़राब होती  चली गयी . चौधरी साहब किसी गल्ला मंडी में मुंशी की नौकरी करने लगे . आते जाते लोगों को बोल देते की घर में  खाली बैठना अच्छा नहीं लगता इसलिए मुंशी गीरी करने लगा हूँ . पर चेहरे पर छायी झुर्रियां  उनसे पहले उनकी बात को गलत बता देती. 

      धीरे धीरे उनके ऊपर उधार और क़र्ज़ बढ़ता चला गया . मोहल्ले में उधार मिलना भी बंद हो गया तब उन्होंने दूर के किसी खान से कुछ रूपये उधार लिए . उन रुपयों को न चुका पाने की स्थिति का वर्णन भी इस कहानी में बहुत ही संजीदगी  के साथ किया गया है.

  और एक दिन खान नाराज होकर  अपने उधार पैसे मांगने  आ धमकता है, चौधरी  को घर पर  न पाकर वो गुस्से में घर के परदे पर अपना डंडा चला देता है . पर्दा जो की  चौधरी की आर्थिक स्थिति से भी अधिक  दयनीय हो चूका था , गिर जाता है और सामने आंगन में  उस घर की  महिलाये  फटे पुराने कपड़ों में नज़र आती है ,जिनमे किसी के भी ऊपर  सम्पूर्ण तन ढकने के लायक  वस्त्र नहीं था ,  और वो लौहल विला कुवैत  बोल के नीचे  आ जाता है .

        हमारा जीवन जब दिखावटी पन के  धरातल पर रुका होता तो ऐसी ही कहानियों का जन्म होता है. दूसरों के सामने अपनी  झूटी शान, बड़प्पन  दिखाना  एक प्रकार से मानसिक  पाप है जिससे कई सारे  अपराधों का जन्म होता है. झूठ की परिभा सिर्फ  शब्दों तक ही नहीं  सीमित है  इसमें झूठा आचरण भी शामिल है . जो जैसा है उसको वैसा न बताना ही असत्य है . झूठे शान और बड़प्पन हमारे  कभी काम नहीं आते बल्कि दूसरों के काम आते . अपनी झूठी डींग हांकने  वाला दुसरो को सहायता मांगने का मौका देता है . और हम उस दिखावे के नाते अपनी खराब स्थिति के बावजूद उसकी सहायता करने को मज़बूर हो जाते  हैं. 

    हमारे बढ़े हुए बैंक बैलेंस को जानकर कोई प्रसन्न हो या न हो उसके लिए हम उधार मांगने हेतु एक न्य क्लाइंट अवश्य बन जाते है .और अधिकतर  ये अपने रिश्तेदारों के बीच होता है . अपनी झूठी शान के लिए लोन पर लाये गयी कार ,एक  प्रकार के मानसिक दिवालियेपन की निशानी है जो कि लोन की  क़िस्त कटने कि पूर्व संध्या पर गायब नींद के रूप में प्रति फलित होती है .

    जीवन को वास्तविकता के धरातल पर ही बने रहने दीजिये . दलदल भूमि में बने मकान आपको सुरक्षित रखेंगे ये आपने कैसे सोच लिया ?

    साथ ही साथ जीवन में प्लानिंग बहुत ही आवशयक है . वायु सेना ने एक चीज़ जो सबसे अच्छी सिखाई, वो  है स्टैंड बाई  प्लान.  जीवन में हर एक काम के लिए स्टैंड बाई   प्लान अवश्य रखिये . प्लान “अ” सफल ही  होगा ऐसी स्थिति सबकी नहीं हो सकती . चाहे नौकरी छोड़ने का निर्णय हो,  रिटायरमेंट का प्लान हो    या  रिटायरमेंट के बाद जॉब  प्लैंनिंग हो . सब को बैंक में नौकरी मिल रही इससे हमे मिलने कि गॉरन्टी  तो नहीं मिल जाती .

      रिटायरमेंट के बाद कोई काम करना है तो उसमे भी प्लान बी अवश्य रखिये . और सबसे बड़ी बात आप अपने से न्याय करना सीखिए.

                     " जय हिन्द "

                                                                                                           - मार्कण्डेय तिवारी (व्याकुल )

                                                                                                             एयर वेटरन

        भारतीय   वायु सेना 

                                                                                          9754967919


Comments

Popular posts from this blog

Non Destructive testing

कविता "बदला "